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अवतरण
अथ प्रमाणपरीक्षा -
इस प्रकार सम्पूर्ण परीक्षाओं में आवश्यक होने के कारण (संशय की परीक्षा करने के पश्वाद पोटश पदार्थों में प्रथम प्रमाण परीक्षा करने वाले सूत्रकार के आक्षेप सूत्र की अवतरणिका देते हुए भाध्यकार कहते हैं कि (अब संशय की परीक्षा के पश्चाद) प्रमाण पदार्थ की परीक्षा की जाती है यद्यपि यहां पर आर्थिक क्रम से संशय की परीक्षा करने में उद्देश के क्रम में बाध आ जाता है। किन्तु प्रमाणादिकों में तो बाध का कारण न होने से उद्देश के क्रम के अनुसार प्रमेयादि पदार्थों के पूर्व में प्रमाणों की ही परीक्षा करना उचित है। उसमें भी प्रथम प्रमाणों के सामान्य लक्षण की परीक्षा की जाती है, क्योंकि सामान्य लक्षण पूर्वक ही उनके विशेष लक्षणों की परीक्षा करना उचित है जिसमें 'उपलब्धि साधनं प्रमाणम्' ज्ञान के साधन प्रमाण होते हैं यह प्रत्यक्षादि प्रमाणों का सामान्य लक्षण है, जो प्रत्यक्षादि प्रमाणों में रहता है) (उसमें पूर्वपक्षी के मत से प्रत्यक्षादि प्रमाणों के प्रमाण होने पर आपत्ति दिखाते हुए सूत्रकार कहते हैं)-
सूत्र
प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः 2/1/8
पदच्छेद
प्रत्यक्षादीनां, अप्रमाण्यं, त्रैकाल्यासिद्धेः ।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | प्रत्यक्षादीनां | प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द में |
| 2 | अप्रमाण्यं | प्रमाणता नहीं हो सकती |
| 3 | त्रैकाल्यासिद्धेः | उनके प्रमेय पदार्थों के पूर्व, उत्तर तथा समान काल ऐसी त्रिकाल में सिद्धि न होने से |