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सूत्र
विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः 2/1/3
पदच्छेद
विप्रतिपत्तौ च, सम्प्रतिपत्तेः।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | विप्रतिपत्तौ च | और विरुद्ध दो कोटियों के ज्ञान में भी |
| 2 | सम्प्रतिपत्तेः | यथार्थ ज्ञान होने के कारण (उसके संप्रतिपत्ति होने से संशय) नहीं हो सकता |
सूत्रकार
आत्मा है ऐसा एक पक्ष का निश्चित ज्ञान, तथा दूसरे पक्ष का आत्मा नहीं है ऐसा निश्चित ज्ञान ये दोनों विरुद्धकोटि के ज्ञान जब निश्चयरूप हैं तो ऐसा होने से यदि संशय होता है तो वह निश्चय ही संशय उत्पन्न होता है, अतः विप्रतिपत्ति संशय की कारण नहीं हो सकती यह इस सूत्र में पूर्वपक्षी का आशय है।
भाष्यकार
(तृतीय सूत्र की भाष्यकार व्याख्या करते हैं कि) - पूर्वपक्षी कहता है कि सिद्धान्ती संशय के तृतीय लक्षण में जिस विरुद्धकोटि के ज्ञानरूप विप्रतिपत्ति के संशय का कारण मानता है वह संप्रतिपत्ति (उसके विरुद्ध निश्चितं ज्ञान) है। क्योंकि वह 'आत्मा है तथा नहीं है' इस वाक्य में अस्तिता तथा नास्तिता इन दोनों विरुद्ध धर्मों को विषय करती है। ऐसा होने से यदि विप्रतिपत्ति से संशय होता है तो वह उपरोक्त उन दोनों विरुद्ध धर्मों के 'संप्रतिपत्ति' (निश्चितज्ञान ही) से होता है ( न कि विप्रतिपत्ति से ) ।