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सूत्र
विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च 2/1/2
पदच्छेद
विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायात् च ।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायात् च | और विप्रतिपत्ति (विरुद्धकोटि ज्ञान) एवं सत् तथा असत् पदार्थ की उपलब्धि एवं अनुपलब्धि की अव्यवस्था के ज्ञान से भी संशय होता है, न कि उनके रहने मात्र से |
सूत्रकार
विप्रतिपत्ति एवं उपलब्धि तथा अनुपलब्धि की अव्यवस्था को जो संशय का कारण माना गया है वह भी नहीं हो सकता, क्योंकि केवल विप्रतिपत्ति तथा उपरोक्त दोनों अव्यवस्थाओं के रहने से ही संशय नहीं होता किन्तु उनके ज्ञान से यह पूर्वपक्षी का आशय है (यह भी पूर्वपक्षिमत का सूत्र है इसमें भी प्रथमाध्याय में वर्णित संशय लक्षण के सूत्र में वर्तमान 'उपपत्तिपद' को लेकर पूर्वपक्ष है। उसमें भी प्रथम भाष्यकार का आगे भाष्य में दिखाया जानेवाला 'तत्' यह पद केवल विप्रतिपत्ति की सत्ता मानकर, एवं 'अथवा' इत्यादि द्वितीय कल्प में 'तार' यह पदज्ञान का बोधक है, यह समझकर भाष्यकार ने दो प्रकार से विप्रतिपक्ष में पूर्वपक्षिमत से तृतीय संशय लक्षण का असंभव दिखाया है
भाष्यकार
(इसी आशय से भाष्यकार प्रथम मत से व्याख्या करते हैं कि) - केवल विप्रतिपत्ति (विरुद्ध दो कोटि (पक्ष) होने से ही, केवल सत् भी पदार्थ उपलब्ध होता है असत् भी, कहीं देखे पदार्थ में यह सत् है, अथवा असत्, इसी प्रकार सत् और असत पदार्थ के न उपलब्ध होने पर अनुपलब्धि की भी केवल संशय सूत्र में प्रथमाध्याय में विस्तार से वर्णन की गई है) अव्यवस्था से भी संशय नहीं हो सकता (प्रश्न) - तो किससे संशय होता है ? (उत्तर) - किन्तु दोनों विरुद्ध कोटियों (पक्षों) के ज्ञान से संशय होता है। इसी प्रकार (उपलब्धि तथा अनुपलब्धि की पूर्वोक्त केवल अव्यवस्था रहने से ही संशय नहीं होता, किन्तु उनके ज्ञान से) अव्यवस्था में भी जानना (दूसरे प्रकार से पूर्वपक्षी के मत से आक्षेप इस सूत्र में दिखाते हुए भाष्यकार कहते हैं कि)-अथवा कुछ विद्वान् 'आत्मा की सत्ता है' ऐसा कहते हैं, और दूसरे विद्वान् 'आत्मा की सत्ता नहीं है' ऐसा मानते हैं, ऐसा ज्ञान होने पर संशय कैसे होगा' इस प्रकार इस सूत्र में पूर्वपक्षी का आशय है। तथा उपलब्धि की व्यवस्था नहीं है, एवं अनुपलब्धि की भी व्यवस्था नहीं है ऐसा विभाग (पृथक्-पृथक्) निश्चय होने पर संशय नहीं हो सकता इसलिये संशय लक्षण सूत्र अयुक्त है (अर्थात् उपलब्धि तथा अनुपलब्धि का निश्चय नहीं है इतना ही जानने वाले मनुष्य को संदेह नहीं हो सकता, बल्कि ऐसी अवस्था में उसके विषय का किसी प्रकार का ज्ञान नहीं हो सकता)।