2/1/1
सूत्र
समानानेकधर्माध्यवसायादन्यतरधर्माध्यवसायाद्वा न संशयः 2/1/1
पदच्छेद
समानाधर्माध्यवसायात्, अन्यतरधर्माध्यवसायात् वा, न संशयः ।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | समानाधर्माध्यवसायात् | साधारण तथा अनेक (विशेष) धर्म के निश्चय से |
| 2 | अन्यतरधर्माध्यवसायात् वा | अथवा दो में से एक किसी धर्म के निश्चय से संशय होता है, अतः (केवल समान अथवा विशेष धर्म से) |
| 3 | न संशयः | संशय नहीं हो सकता |
सूत्रकार
प्रथमाध्याय के प्रथम आह्निक के २३ वें सूत्र में कथित समान धर्म, अथवा विशेष धर्म के रहने से संशय नहीं हो सकता, क्योंकि समान तथा विशेष धर्म के अध्यवसाय (निश्चित-ज्ञान) से संशय होता है। (इस सूत्र में प्रथमाध्याय के प्रथमाह्निक के २३वें सूत्र में कहे हुए सम्पूर्ण संशयों के कारणों को लेना चाहिये। यहाँ इस सूत्र से पाँचवें सूत्र तक पूर्वपक्ष है और दो सूत्रों में उत्तर पक्ष है) ।
भाष्यकार
(इस सूत्र में 'समानधर्म के अध्यवसाय से संशय नहीं होता' ऐसा सूत्र के अक्षरों का अर्थ स्पष्ट होने के कारण 'समानस्य धर्मस्याध्यवसायात् संशयः' समान ऐसे धर्म के अध्यवसाय से संशय होता है, ऐसी भाष्यकार की व्याख्या सूत्र के विरुद्ध (असंगत) सी प्रतीत होती है। जिसका कुछ विद्वान् ऐसा परिहार करते हैं कि ) - "न जाना हुआ धर्म केवल संशय में कारण न होने से उसका निश्चय होने पर, निश्चय का संशय के विरोधी स्वभाव होने के कारण अज्ञान धर्म संशय का कारण नहीं हो सकता" किन्तु यही आशय आगे अथवा 'नाध्यवसायादवचारणाव धरान संशय उपपद्यते' अर्थ के निश्चित ज्ञानरूप अध्यवसाय से अनिश्चित ज्ञानरूप संशय नहीं हो सकता. ऐसे इस चतुर्थ कल्प में भाष्यकार ने स्पष्ट कहा है। अतः वही प्रथम इस कल्प के अर्थ का आशय नहीं हो सकता। इस असंगति को वार्तिक तथा तात्पर्यटीकाकार ने सुचित किया है, इसी कारण इस पूर्वपक्षी की उक्ति के यथाश्रुत अर्थ से पूर्वपक्षी के प्रथम सूत्र की भूमिका कही है, और तात्पर्यटीकाकार ने 'समानधर्मोपपत्त्यादि' विशेषण को न देखकर पूर्व-पक्षी का यह सूत्र है ऐसा कहा है। इस सूत्र में तीन वाक्य हैं- (१) 'समानधर्माध्यवसायात् न संशयः' समानधर्म के ज्ञान से संशय नहीं होता, यह वाक्य प्रथमाध्याय के प्रथमाह्निक के २३ वें सूत्र में कहे गये 'समानधर्मोपपत्तेः समानधर्म के होने से संशय होता है इस वाक्य का निषेधरूप है। इस वाक्य का भाष्यकार ने आगे 'अथवा' ऐसी चार उक्ति से तात्पर्य वर्णन किया है। संशय-लक्षण के सूत्र के उपपत्ति पद का समानधर्म का अस्तित्व (होना), यह अर्थ समझकर ही पूर्वपक्षी की केवल समानधर्म के रहने से संशय नहीं होता किन्तु उसका ज्ञान होने से ऐसा प्रथम कहता है। और संशय लक्षण के उपपत्ति पद का सामान्य ज्ञानरूप अर्थ समझकर 'अथवा समानमनयौ' यह द्वितीय पूर्वपक्षि वाक्य है। पुनः 'अथवा समानधर्मा' इत्यादि तीसरा वाक्य है, उपपत्ति पद का निश्चय रूप ज्ञान अर्थ समझकर । और उपरोक्त इस तीसरी ही उक्ति का दूसरे प्रकार से वर्णन पूर्वपक्षी का 'अथवा नाध्यवसायात्' यह चतुर्थ वाक्य है। इस पूर्वपक्षी के सूत्र में (२) दूसरा सूत्र का वाक्य है 'अनेकधर्माध्यवसायान्न संशयः' विशेष धर्म के अध्यवसाय से संशय नहीं हो सकता, यह वाक्य संशयलक्षण के सूत्र में उपपत्तिपद के प्रयोग के कारण है। इसमें भी समानधर्म के पक्ष के समान चार पक्ष की उक्ति हो सकती है। (३) तीसरा सूत्र का वाक्य है 'अन्यतरधर्माध्यवसायान्न संशयः' दो में से किसी एक धर्म के ज्ञान से संशय नहीं हो सकता)। (आगे पूर्वपक्षी के मत से दूसरा अर्थ करते हुए भाष्यकार आक्षेप दिखाते हैं कि) -अथवा मैं इन दोनों के समानधर्म को जान रहा हूँ इस प्रकार जबकि ऊंचाई आदि धर्म तथा वृक्ष और पुरुषरूप धर्मों का ज्ञान होता है तो संशय कैसे होगा। (तथा तीसरे अभिप्राय से पूर्वपक्षी ऐसा कह सकता है कि)- अथवा समानधर्म के ज्ञान से भिन्न धर्मीरूप (अर्थ) में संशय नहीं हो सकता। क्योंकि रूप के ज्ञान के विषयरूप से भिन्न स्पर्श का रूप के ज्ञान से 'संशय' नहीं होता । (चतुर्थ पूर्वपक्षी का यह आशय हो सकता है कि)- अथवा समानधर्म के अध्यवसायरूप अर्थ के निश्चयरूप कारण से अनिश्चय (रूप) संशयज्ञान कार्य कैसे हो सकता है, क्योंकि कार्य (संशय) तथा कारण (निश्चय) इन दोनों में समानरूपता नहीं है (अर्थात् संशय कार्य के अनिश्चितरूप होने से उसका कारण निश्चयरूप ज्ञान नहीं हो सकता, निश्वय-अनिश्चय का कारण नहीं हो सकता)। (आगे समानधर्मज्ञान में कहे हुए पूर्वपक्षी के चार प्रकार के संशय के पूर्वोक्त लक्षण में आक्षेप दिखाकर उसी के समान, तथा अनेक (विशेष) धर्मज्ञान से उत्पन्न संशय के लक्षण में भी चार प्रकार के असंभव की समानता देखाते हुए भाष्यकार कहते हैं कि इस (समानधर्म) से उत्पन्न संशय के लक्षण की अनुपपत्ति (न होने) से अनेक (विशेष) धर्म के ज्ञान से संशय होता है न कि केवल अनेक धर्म के रहने से यह भी व्याख्या की गई है। तथा दो धर्मों में से किसी एक धर्म के निश्चित ज्ञान के ज्ञान से संशय नहीं होता, क्योंकि उस निश्चय ज्ञान-रूप अध्यवसाय से दोनों में से एक धर्म का निश्चित ज्ञान ही होता है"।