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सूत्र
स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा 1/2/3
पदच्छेद
स, प्रतिपक्षस्थापनाहीनः, वितण्डा।
पदपदार्थ
| संख्या | पद | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | सः | वह (जल्प) |
| 2 | प्रतिपक्षस्थापनाहीनः | विरुद्ध पक्ष की स्थापना से रहित |
| 3 | वितण्डा | वह वितण्डा कथा होती है |
सूत्रकार
पूर्वोक्त लक्षण वाले जल्पकथा में विरुद्ध पक्ष की अनुमान प्रयोग द्वारा स्थापना जिसमें नहीं होती, केवल वादी का खण्डन किया जाता है, उसे वितण्डा कथा कहते हैं। (अर्थात् पूर्ववादी के पक्ष की अपेक्षा प्रतिवादी का अन्य पक्ष ही 'प्रतिपक्ष' कहाता है ) उसकी स्थापना से रहित कथा वितण्डा नामक कथा होती है
भाष्यकार
वह ( पूर्वसूत्र में कही हुई ) जल्पनामक कथा वितण्डा कथा होती है। ( प्रश्न )- कैसे विशेषण वाली ( अर्थात् कैसी जल्प कथा वितण्डा कथा कहाती है ! ( उत्तर ) - जिसमें विरुद्ध पक्ष की स्थापना न हो उस जल्प कथा को ही वितण्डा कथा कहते हैं। अर्थात् जो पूर्व में एक आधार में विरुद्ध दो धर्म पक्ष तथा प्रतिपक्ष कहाते है ऐसा कहा गया है उन दोनों में से वितण्डा कथा करने वाला ( वैतण्डिक ) एक अपने विरुद्ध पक्ष को स्थापना नहीं करता किन्तु पूर्ववादी के पक्ष का खण्डन करते हुए ही वितण्डा कथा में प्रवृत्त होता है।
( शंका ) - यदि ऐसा है कि वितण्डा कथा में विरुद्ध पक्ष की स्थापना नहीं है तो 'प्रतिपक्ष-विरुद्धपक्ष से रहित जल्पकथा' वितण्डाकथा कहाती है इतना ही लक्षण करना सूत्रकार को उचित था। (अर्थात् ) वितण्डा कथा में जब विरुद्ध पक्ष की स्थापना नहीं है तो उससे संस्थापन किया जाने वाला पक्ष भी नहीं है, क्योंकि बिना स्थापना के पक्ष हो नहीं सकता, जिससे 'प्रतिपक्ष की स्थापना से हीन इस उक्ति से प्रतिपक्ष रहित वितण्डाकथा होती है' यह शंका का तात्पर्य है
(उत्तर) - जो वह प्रतिवादी का पूर्ववादी के पक्ष के खण्डन करने वाला वाक्य है, वही वितण्डा कथा करने वाले का पक्ष है, किन्तु वह वितण्डा करने वाला किसी साधने योग्य अर्थ की प्रतिज्ञा कर उसकी साधन द्वारा स्थापना नहीं करता, अतः सूत्रकार ने जैसा लक्षण का उपन्यास ( कथन ) किया है वही युक्त होने से सही (अर्थात् वैतण्डिक) वितण्डा करने वाला भी वादी यह समझ कर कि अन्त में प्रत्यक्ष से ही अर्थ की सिद्धि होगी अपने पक्ष की स्थापन न करता हुआ केवल पूर्ववादी के पक्ष का खण्डन करता है, इस कारण वैतण्डिक का यह खण्डन वाक्य ही इसका पक्ष है ऐसा गौण पक्ष शब्द का व्यवहार होता है। (अर्थात् यह पक्ष होना केवल योग्यता है न कि स्थापना होने से यह तात्पर्य है )
भाषान्तर
Cavil is a Kind of wrangling which consists in mere attacks on the opposite side.
A caviller does not endeavour to establish anything, but confines himself to mere carping at the arguments of his opponent