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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.72।।इसके द्वारा आचार्यका या कर्तव्य प्रदर्शित किया जाता है? कि दूसरे उपायको स्वीकार करके किसी भी प्रकारसे? शिष्यको कृतार्थ करना चाहिये --, हे पार्थ क्या तूने मुझसे कहे हुए इस शास्त्रको एकाग्रचित्तसे सुना सुनकर बुद्धिमें स्थिर किया अथवा सुनाअनसुना कर दिया हे धनंजय क्या तेरा अज्ञानजनित मोह -- स्वाभाविक अविवेकताचित्तका मूढ़भाव सर्वथा नष्ट हो गया? जिसके लिये कि तेरा यह शास्त्रश्रवणविषयक परिश्रम और मेरा वक्तृत्वविषयक परिश्रम हुआ है।