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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.67।।इस अठारहवें अध्यायमें समस्त गीताशास्त्रके अर्थका उपसंहार करके फिर विशेषरूपसे इस अन्तिम श्लोकमें शास्त्रके अभिप्रायको दृढ़ करनेके लिये संक्षेपसे उपसंहार करके? अब शास्त्रसम्प्रदायकी विधि बतलाते हैं।
तेरे हितके लिये अर्थात् संसारका उच्छेद करनेके लिये? कहा हुआ यह शास्त्र? तपरहित मनुष्यको नहीं सुनाना चाहिये। इस प्रकार वाच्यम् इस व्यवधानयुक्त पदसे न का सम्बन्ध है। तपस्वी होनेपर भी जो अभक्त हो अर्थात् गुरु या देवतामें भक्ति रखनेवाला न हो उसे कभीकिसी अवस्थामें भी नहीं सुनाना चाहिये। भक्त और तपस्वी होकर भी जो शुश्रूषु ( सुननेका इच्छुक ) न हो उसे भी नहीं सुनाना चाहिये। तथा जो मुझ वासुदेवको प्राकृत मनुष्य मानकर? मुझमें दोषदृष्टि करता हो? मुझे ईश्वर न जाननेसे? मुझमें आत्मप्रशंसादि दोषोंका अध्यारोप करके? मेरे ईश्वरत्वको सहन न कर सकता हो वह भी अयोग्य है? उसे भी,( यह शास्त्र ) नहीं सुनाना चाहिये। अथपित्तिसे यह निश्चय होता है कि यह शास्त्र भगवान्में भक्ति रखनेवाले? तपस्वी? शुश्रूषायुक्त और दोषदृष्टिरहित पुरुषको ही सुनाना चाहिये। अन्य स्मृतियोंमें मेधावीको या तपस्वीको? इस प्रकार इन दोनोंका विकल्प देखा जाता है? इसलिये यह समझना चाहिये कि शुश्रूषा और भक्तियुक्त तपस्वीको अथवा इन तीनों गुणोंसे युक्त मेधावीको यह शास्त्र सुनाना चाहिये। शुश्रूषा और भक्तिसे रहित तपस्वी या मेधावी किसीको भी नहीं सुनाना चाहिये। भगवान्में दोषदृष्टि रखनेवाला तो यदि सर्वगुणसम्पन्न हो? तो भी उसे नहीं सुनाना चाहिये। गुरु शुश्रूषा और भक्तियुक्त पुरुषको ही सुनाना चाहिये। इस प्रकार यह शास्त्रसम्प्रदायकी विधि है।
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