Sbg 18.51 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.51।।वह ज्ञानकी परा निष्ठा किस प्रकार करनी चाहिये सो कहते हैं --, विशुद्ध -- कपटरहित निश्चयात्मिका बुद्धिसे संपन्न पुरुष? धैर्यसे कार्यकरणके संघातरूप आत्माको,( शरीरको ) संयम करके -- वशमें करके शब्दादि विषयोंको? अर्थात् शब्द जिनका आदि है ऐसे सभी विषयोंको छोड़कर? प्रकरणके अनुसार यहाँ यह अभिप्राय है कि केवल शरीरस्थितिमात्रके लिये जिन विषयोंकी आवश्यकता है? उनसे अतिरिक्त सुखभोगके लिये जो अधिक विषय हैं? उन सबको छोड़कर तथा शरीरस्थितिके निमित्त प्राप्त हुए विषयोंमें भी? रागद्वेषका अभाव करकेत्याग करके।