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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.49।।ज्ञाननिष्ठाकी योग्यताप्राप्तिरूप जो कर्मजनित सिद्धि कही गयी है? उसकी फलभूत ज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि भी कही जानी चाहिये। इसलिये अगला श्लोक आरम्भ किया जाता है --, जो सर्वत्र असक्तबुद्धि है -- पुत्र? स्त्री आदि जो आसक्तिके स्थान हैं? उन सबमें जिसका अन्तःकरण आसक्तिसे -- प्रीतिसे रहित हो चुका है। जो जितात्मा है -- जिसका आत्मा यानी अन्तःकरण जीता हुआ है अर्थात् वशमें किया हुआ है। जो स्पृहारहित है -- शरीर? जीवन और भोगोंमें भी जिसकी स्पृहा -- तृष्णा नष्ट हो गयी है। जो ऐसा आत्मज्ञानी है? वह परम नैष्कर्म्यसिद्धिको ( प्राप्त करता है )। निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है यह ज्ञान होनेके कारण जिसके सर्वकर्म निवृत्त हो गये हैं वह निष्कर्मा है। उसके भावका नाम नैष्कर्म्य है और निष्कर्मतारूप सिद्धिका नाम नैष्कर्म्यसिद्धि है। अथवा निष्क्रिय आत्मस्वरूपसे स्थित होनारूप निष्कर्मताका सिद्ध होना ही नैष्कर्म्यसिद्धि है। ऐसी जो कर्मजनित सिद्धिसे विलक्षण और सद्योमुक्तिमें स्थित होनारूप उत्तम सिद्धि है? उसको संन्यासके द्वारा? यानी यथार्थ ज्ञानसे अथवा ज्ञानपूर्वक सर्वकर्मसंन्यासके द्वारा? लाभ करता है ऐसा ही कहा भी है कि सब कर्मोंको मनसे छोड़कर न करता हुआ और न करवाता हुआ रहता है।