Sbg 18.27 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.27।।जो कर्ता रागी है -- जिसमें राग यानी आसक्ति विद्यमान है? जो कर्मफलको चाहनेवाला है -- कर्मफलकी इच्छा रखता है? जो लोभी यानी दूसरोंके धनमें तृष्णा रखनेवाला है और तीर्थादि ( उपर्युक्त देशकाल ) में भी अपने धनको खर्च करनेवाला नहीं है। तथा जो हिंसात्मक -- दूसरोंको कष्ट पहुँचानेके स्वभाववाला? अशुचि -- बाहरी और भीतरी दोनों प्रकारका शुद्धिसे रहित और हर्षशोकसे लिप्त यानी इष्ट पदार्थकी प्राप्तिमें हर्ष एवं अनिष्टकी प्राप्ति और इष्टके वियोगमें होनेवाला शोक -- इन दोनों प्रकारके भावोंसे युक्त है? -- ऐसे पुरुषको ही कर्मोंकी सिद्धिअसिद्धिमें हर्षशोक हुआ करते हैं? अतः जो कर्ता उन दोनोंसे युक्त है? वह राजस कहा जाता है।