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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.19।।क्रिया? कारक और फल सभी त्रिगुणात्मक हैं? अतः सत्त्व? रज और तम इन तीनों गुणोंके भेदसे उन सबका त्रिविध भेद बतलाना है। सो आरम्भ करते हैं --, यहाँ कर्म शब्दका अर्थ क्रिया है? कर्ताका अत्यन्त इष्ट पारिभाषिक शब्द कारकरूप कर्म नहीं। ज्ञान? कर्म और कर्ता अर्थात् क्रिया करनेवाला -- ये तीनों ही? गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रोंमें अर्थात् कपिलमुनिप्रणीत शास्त्रमें गुणोंके भेदसे यानी सात्त्विक आदि भेदसे? प्रत्येक तीनतीन प्रकारके बतलाये गये हैं। यहाँ त्रिधाके साथ एव शब्द जोड़कर यह आशय प्रकट किया गया है? कि उक्त तीनों पदार्थ गुणोंसे अतिरिक्त अन्य जातिके नहीं हैं। वह गुणोंकी संख्या करनेवाला कापिलशास्त्र यद्यपि परमार्थब्रह्मकी एकताके विषयमें (भगवान्के सिद्धान्तसे) विरुद्ध है तो भी गुणोंके भोक्ता ( जीव ) के विषयमें तो प्रमाण है ही। वे कापिलसांख्यके अनुयायी? गुण और गुणके व्यापारका निरूपण करनेमें निपुण हैं। इसलिये उनका शास्त्र भी आगे कहे हुए अभिप्रायकी स्तुति करनेके लिये प्रमाणरूपसे ग्रहण किया जाता है? सुतरां कोई विरोध नहीं है। उनको अर्थात् ज्ञान? कर्म और कर्ताको तथा गुणोंके अनुसार किये हुए उनके सात्त्विक आदि समस्त भेदोंको? तू यथावत् -- जैसा शास्त्रमें न्यायानुसार कहा है उसी प्रकार सुन अर्थात् आगे कही जानेवाली बातमें चित्त लगा।