Sbg 18.15 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.15।।मन? वाणी और शरीरसे अर्थात् इन तीनोंके द्वारा मनुष्य जो कुछ न्याययुक्त -- धर्ममयशास्त्रीय अथवा धर्मविरुद्ध -- अशास्त्रीय कर्म करता है? उन सबके ये उपर्युक्त पाँच हेतु यानी कारण हैं। जीवनके लिये जो कुछ आँख खोलनेमूँदने आदिकी भी चेष्टाएँ की जाती हैं? वे भी? पहले किये हुए पुण्य और पापका ही परिणाम हैं। अतः न्याय और विपरीत ( अन्याय ) के ग्रहणसे ऐसी समस्त चेष्टाओंका भी ग्रहण हो जाता,है। पू 0 -- जब कि अधिष्ठानादि ही समस्त कर्मोंके कारण हैं? तब यह कैसे कहा जाता है कि मन? वाणी और शरीरसे कर्म करता है उ 0 -- यह दोष नहीं है। विहित और निषेधरूप सारे कर्म शरीर? वाणी और मन इन्हीं तीनोंकी प्रधानतासे होनेवाले हैं? तथा देखनासुनना आदि जीवननिमित्तक चेष्टाएँ भी उन्हीं कर्मोंकी अङ्गभूत हैं? इसलिये समस्त कर्मोंको तीन भागोंमें बाँटकर ऐसा कहते हैं कि जो कुछ भी शरीर आदिद्वारा कर्म करता है ( क्योंकि ) फलभोगके समय भी शरीर आदि प्रधान कारणोंद्वारा ही फल भोगा जाता है। सुतरां उपर्युक्त अधिष्ठानादि पाँच कारणोंकी हेतुता ठीक है? इसमें विरोध नहीं है।