Sbg 18.12 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.12।।सर्व कर्मोंका त्याग करनेसे जो फल होता है? वह क्या है इसपर कहते हैं? --, अनिष्ट -- नरक और पशुपक्षी आदि योनिरूप इष्ट -- देवयोनिरूप तथा मिश्र -- इष्ट और अनिष्टमिश्रित मनुष्ययोनिरूप? इस प्रकार यह पुण्यपापरूप कर्मोंका फल तीन प्रकारका होता है। जो पदार्थ बाह्य कर्ता? कर्म? क्रिया आदि अनेक कारकोंद्वारा निष्पन्न हुआ हो और बाजीगरकी मायाके समान? अविद्याजनित? महामोहकारक हो? एवं जीवात्माके आश्रितसा प्रतीत होता हो और साररहित होनेके कारण तत्काल ही लय -- नष्ट हो जाताहो? उसका नाम फल है। यह फल शब्दकी व्याख्या है। ऐसा यह तीन प्रकारका फल? अत्यागियोंको अर्थात् परमार्थसंन्यास न करनेवाले कर्मनिष्ठ अज्ञानियोंको ही? मरनेके पीछे मिलता है। केवल ज्ञाननिष्ठामें स्थित परमहंसपरिव्राजक वास्तविक संन्यासियोंको? कभी नहीं मिलता। क्योंकि ( वे ) केवल सम्यग्ज्ञाननिष्ठ पुरुष? संसारके बीजरूप अविद्यादि दोषोंका मूलोच्छेद नहीं करते? ऐसा कभी नहीं हो सकता।