Sbg 18.11 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.11।।परंतु जो पुरुष कर्माधिकारी है और शरीरमें आत्माभिमान रखनेवाला होनेके कारण देहधारी अज्ञानी है? आत्मविषयक कर्तृत्वज्ञान नष्ट न होनेके कारण जो मैं करता हूँ ऐसी निश्चित बुद्धिवाला है उससे कर्मका अशेष त्याग होना असम्भव होनेके कारण? उसका कर्मफलत्यागके सहित विहित कर्मोंके अनुष्ठानमें ही अधिकार है? उनके त्यागमें नहीं। यह अभिप्राय दिखलानेके लिये कहते हैं --, देहधारीदेहको धारण करे सो देहधारी? इस व्युत्पत्तिके अनुसार शरीरमें आत्माभिमान रखनेवाला देहभृत् कहा जाता है? विवेकी नहीं। क्योंकि वेदाविनाशिनम् इत्यादि श्लोकोंसे वह ( विवेकी ) कर्तापनके अधिकारसे अलग कर दिया गया है। अतः ( यह अभिप्राय समझना चाहिये कि ) जिस कारण उस देहधारीअज्ञानीसे समस्त कर्मोंका पूर्णतया त्याग किया जाना सम्भव नहीं है? इसलिये जो तत्त्वज्ञानरहित अधिकारी? नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करता हुआ उन कर्मोंके फलका त्यागी है? अर्थात् कर्मफलकी वासनामात्रको छोड़नेवाला है? वह कर्म करनेवाला होनेपर भी स्तुतिके अभिप्रायसे त्यागी कहा जाता है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि देहात्माभिमानसे रहित परमार्थज्ञानीके द्वारा ही निःशेषभावसे कर्मसंन्यास किया जा सकता है।