Sbg 18.10 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.10।।विशुद्ध और प्रसन्न अन्तःकरण ही आध्यात्मिक विषयकी आलोचनामें समर्थ होता है। अतः इस प्रकार नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जिसका अन्तःकरण विशुद्ध हो गया है एवं जो आत्मज्ञानके अभिमुख है? उसकी उस आत्मज्ञानमें जिस प्रकार क्रमसे स्थिति होती है? वह कहनी है? इसलिये कहते हैं --, अकुशल -- काम्यकर्मोंसे ( वह ) द्वेष नहीं करता अर्थात् काम्यकर्म पुनर्जन्म देनेवाले होनेके कारण संसारके कारण हैं? इनसे मुझे क्या प्रयोजन है? इस प्रकार उससे द्वेष नहीं करता। कुशलशुभनित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता। अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धि? ज्ञानकी उत्पत्ति और उसमें स्थितिके हेतु होनेसे नित्यकर्म मोक्षके कारण हैं? इस प्रकार उनमें आसक्त नहीं होता। यानी उनमें भी अपना कोई प्रयोजन न देखकर प्रीति नहीं करता। वह कौन है त्यागी? जो कि पूर्वोक्त आसक्ति और फलके त्यागसे सम्पन्न है अर्थात् कर्मोंमें आसक्ति और उनका फल छोड़कर नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाला है? ऐसा त्यागी। ऐसा पुरुष किस अवस्थामें? काम्यकर्मोंसे द्वेष नहीं करता और नित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता सो कहते हैं -- जब कि वह सात्त्विक भावसे युक्त होता है। अर्थात् आत्मअनात्मविषयक विवेकज्ञानके हेतुस्वरूप सत्त्वगुणसे भरपूर -- भली प्रकार व्याप्त होता है। इसीलिये वह मेधावी है अर्थात् आत्मज्ञानरूप बुद्धिसे युक्त है। मेधावी होनेके कारण ही छिन्नसंशय है -- अविद्याजनित संशयसे रहित है। अर्थात् आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही परम कल्याणका साधन है? और कुछ नहीं? इस निश्चयके कारण संशयरहित हो चुका है। जो अधिकारी पुरुष? पूर्वोंक्त प्रकारसे कर्मयोगके अनुष्ठानद्वारा क्रमसे विशुद्धान्तःकरण होकर? जन्मादि विकारोंसे रहित और क्रियारहित आत्माको भली प्रकार अपना स्वरूप समझ गया है? वह समस्त कर्मोंको मनसे त्यागकर न कुछ करता और न कराता हुआ रहनेवाला ( आत्मज्ञानी ) निष्कर्मतारूप ज्ञाननिष्ठाको भोगता है। इस प्रकार इस श्लोकद्वारा यह पूर्वोक्त कर्मयोगका फल बतलाया गया है।