Sbg 18.6 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।18.6।।जो पवित्र करनेवाले बतलाये गये हैं? ऐसे ये यज्ञ? दान और तपरूप कर्म भी तद्विषयक आसक्ति और फलका त्याग करके ही किये जाने चाहिये? अर्थात् आसक्ति और फलके त्यागपूर्वक ही इनका अनुष्ठान करना उचित है। यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है। इस विषयमें मेरा निश्चय सुन इस प्रकार प्रतिज्ञा करके और ( उनकी कर्तव्यतामें ) पावनत्वरूप हेतु बतलाकर जो ऐसा कहना है कि? ये कर्म किये जाने चाहिये यह मेरा निश्चित उत्तम मत है यह प्रतिज्ञा किये हुए विषयका उपसंहार ही है? किसी अपूर्व विषयका वर्णन नहीं है क्योंकि एतानि शब्दका आशय प्रकरणमें अत्यन्त निकटवर्ती विषयको ही लक्ष्य कराना होता है। आसक्तियुक्त और फलेच्छुक मनुष्योंके लिये यद्यपि ये ( यज्ञ? दान और तपरूप ) कर्म बन्धनके कारण हैं? तो भी मुमुक्षुको ( फलआसक्तिसे रहित होकर ) करने चाहिये? यही अपि शब्दका अभिप्राय है। यहाँ,( यज्ञ? दान और तपसे अतिरिक्त ) अन्य ( काम्य ) कर्मोंको लक्ष्य करके एतानि के साथ अपि शब्दका,प्रयोग नहीं है। कुछ अन्य टीकाकार कहते हैं कि नित्यकर्मोंके फलका अभाव होनेके कारण उनको फल और आसक्ति छोड़कर कर्तव्य बतलाना नहीं बन सकता? ( अतः ) एतान्यपि इस पदका अभिप्राय यह है कि जो नित्यकर्मोंसे अतिरिक्त काम्य कर्म है वे भी करने चाहिये? फिर यज्ञ? दान और तपरूप नित्यकर्मोंके विषयमें तो कहना ही क्या है। यह अर्थ ( करना ) ठीक नहीं क्योंकि यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि इत्यादि वचनोंसे नित्यकर्मोंका भी फल होता है यह सिद्ध किया गया है। नित्यकर्मोंको भी बन्धनकारक होनेकी आशङ्कासे छोड़नेकी इच्छा रखनेवाले मुमुक्षुकी प्रवृत्ति काम्यकर्मोंमें कैसे हो सकती है इसके सिवा सकाम कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं इस कथनमें काम्यकर्मोंकी निन्दा की जानेके कारण और,यथार्थ कर्मके अतिरिक्त अन्य कर्म बन्धन कारक हैं इस कथनसे काम्यकर्म बन्धनकारक माने जानेके कारण? एवं वेद त्रिगुणात्मक (संसार) को विषय करनेवाले हैं तीनों वेदोंको जाननेवाले सोमरस पीनेवाले पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं ऐसा कहा जानेके कारण और साथ ही काम्यकर्मोंका विषय बहुत दूर व्यवधानयुक्त होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि ) एतान्यपि यह कथन काम्यकर्मोंके विषयमें नहीं है।