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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।17.20।।अब दानके भेद कहे जाते हैं --, जो दान देना ही उचित है मनमें ऐसा विचार करके अनुपकारीको? जो कि प्रत्युपकार करनेमें समर्थ न हो? यदि समर्थ हो तो भी जिससे प्रत्युपकार चाहा न गया हो? ऐसे अधिकारीको दिया जाता है तथा जो कुरुक्षेत्र आदि पुण्यभूमिमें? संक्रान्ति आदि पुण्यकालमें और छहों अङ्गोंके सहित वेदको जाननेवाले ब्राह्मण आदि श्रेष्ठ पात्रको दिया जाता है वह दान सात्त्विक कहा गया है।