Sbg 17.17 hcrskd

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Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas ।।17.17।। व्याख्या -- श्रद्धया परया तप्तम् -- शरीर? वाणी और मनके द्वारा जो तप किया जाता है? वह तप ही मनुष्योंका सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य है और यही मानवजीवनके उद्देश्यकी पूर्तिका अचूक उपाय है (टिप्पणी प 0 854) तथा इसको साङ्गोपाङ्ग -- अच्छी तरहसे करनेपर मनुष्यके लिये कुछ करना बाकी नहीं रहता अर्थात् जो वास्तविक तत्त्व है? उसमें स्वतः स्थिति हो जाती है -- ऐसे अटल विश्वासपूर्वक श्रेष्ठ श्रद्धा करके बड़ेबड़े विघ्न और बाधाओंकी कुछ भी परवाह न करते हुए उत्साह एवं आदरपूर्वक तपका आचरण करना ही परम श्रद्धासे युक्त मनुष्योंद्वारा उस तपको करना है। अफलाकाङ्क्षिभिः युक्तैः नरैः -- यहाँ इन दो विशेषणोंसहित नरैः पद देनेका तात्पर्य यह है कि आंशिक सद्गुणसदाचार तो प्राणिमात्रमें रहते ही हैं परन्तु मनुष्यमें यह विशेषता है कि वह सद्गुणसदाचारोंको साङ्गोपाङ्ग एवं विशेषतासे अपनेमें ला सकता है और दुर्गुणदुराचार? कामना? मूढ़ता आदि दोषोंको सर्वथा मिटा सकता है। निष्कामभाव मनुष्योंमें ही हो सकता है।सात्त्विक तपमें तो नर शब्द दिया है परन्तु राजसतामस तपमें मनुष्यवाचक शब्द दिया ही नहीं। तात्पर्य यह है कि अपना कल्याण करनेके उद्देश्यसे मिले हुए अमूल्य शरीरको पाकर भी जो कामना? दम्भ? मूढ़ता आदि दोषोंको पकड़े हुए हैं? वे मनुष्य कहलानेके लायक ही नहीं हैं।फलकी इच्छा न रखकर निष्कामभावसे तपका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंके लिये यहाँ उपर्युक्त पद आये हैं। तपस्तत्ित्रविधम् -- यहाँ केवल सात्त्विक तपमें त्रिविध पद दिया है और राजस तथा तामस तपमें,त्रिविध पद न देकर यत्तत् पद देकर ही काम चलाया है। इसका आशय यह है कि शारीरिक? वाचिक और मानसिक -- तीनों तप केवल सात्त्विकमें ही साङ्गोपाङ्ग आ सकते हैं? राजस तथा तामसमें तो आंशिकरूपसे ही आ सकते हैं। इसमें भी राजसमें कुछ अधिक लक्षण आ जायँगे क्योंकि राजस मनुष्यका शास्त्रविधिकी तरफ खयाल रहता है। परन्तु तामसमें तो उन तपोंके बहुत ही कम लक्षण आयँगे क्योंकि तामस मनुष्योंमें मूढ़ता? दूसरोंको कष्ट देना आदि दोष रहते हैं।दूसरी बात? तेरहवें अध्यायमें सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक जो ज्ञानके बीस साधनोंका वर्णन आया है? उनमें भी शारीरिक तपके तीन लक्षण -- शौच? आर्जव और अहिंसा तथा मानसिक तपके दो लक्षण -- मौन और आत्मविनिग्रह आये हैं। ऐसे ही सोलहवें अध्यायमें पहलेसे तीसरे श्लोकतक जो दैवीसम्पत्तिके छब्बीस लक्षण बताये गये हैं? उनमें भी शारीरिक तपके तीन लक्षण -- शौच? अहिंसा और आर्जव तथा वाचिक तपके दो लक्षण -- सत्य और स्वाध्याय आये हैं। अतः ज्ञानके जिन साधनोंसे तत्त्वबोध हो जाय तथा दैवीसम्पत्तिके,जिन गुणोंसे मुक्ति हो जाय? वे लक्षण या गुण राजसतामस नहीं हो सकते। इसलिये राजस और तामस तपमें शारीरिक? वाचिक और मानसिक -- यह तीनों प्रकारका तप साङ्गोपाङ्ग नहीं लिया जा सकता। वहाँ तो यत्तत् पदोंसे आंशिक जितनाजितना आ सके? उतनाउतना ही लिया जा सकता है।तीसरी बात? भगवद्गीताका आदिसे अन्ततक अध्ययन करनेपर यह असर पड़ता है कि इसका उद्देश्य केवल जीवका कल्याण करनेका है। कारण कि अर्जुनका जो प्रश्न है? वह निश्चित श्रेय(कल्याण) का है (2। 7 3। 2 5। 1)। भगवान्ने भी उत्तरमें जितने साधन बताये हैं? वे सब जीवोंका निश्चित कल्याण हो जाय -- इस लक्ष्यको लेकर ही बताये हैं। इसलिये गीतामें जहाँकहीं सात्त्विक? राजस और तामस भेद किया गया है? वहाँ जो सात्त्विक विभाग है? वह ग्राह्य है क्योंकि वह मुक्ति देनेवाला है -- दैवी सम्पद्विमोक्षाय और जो राजसतामस विभाग है? वह त्याज्य है क्योंकि वह बाँधनेवाला है -- निबन्धायासुरी मता। इसी आशयसे भगवान् यहाँ सात्त्विक तपमें शारीरिक? वाचिक और मानसिक -- इन तीनों तपोंका लक्ष्य करानेके लिये त्रिविधम् पद देते हैं। सात्त्विकं परिचक्षते -- परम श्रद्धासे युक्त? फलको न चाहनेवाले मनुष्योंके द्वारा जो तप किया जाता है? वह सात्त्विक तप कहलाता है।