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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।17.11।।अब तीन प्रकारके यज्ञ बतलाये जाते हैं --, फलकी इच्छा न करनेवाले पुरुषोंद्वारा? शास्त्रविधिसे नियत किये हुए जिस यज्ञका अनुष्ठान किया जाता है?,तथा यज्ञ करना ही यानी यज्ञके स्वरूपका सम्पादन करना ही कर्तव्य है इस प्रकार मनका समाधान करके अर्थात् इससे मुझे कोई पुरुषार्थ सिद्ध नहीं करना है ऐसा निश्चय करके जो यज्ञ किया जाता है? वह सात्त्विक कहलाता है।