Sbg 17.7 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।17.7।।रसयुक्त और स्निग्ध आदि भोजनोंमें? अपनी रुचिकी अधिकतारूप लक्षणसे अपना सात्त्विकत्व? राजसत्व और तामसत्व जानकर? राजस और तामस चिह्नोंवाले आहारका त्याग और सात्त्विक चिह्नयुक्त आहारका ग्रहण करनेके लिये? यहाँ रस्यस्निग्ध आदि ( वाक्योंद्वारा वर्णित ) तीन वर्गोंमें विभक्त हुए आहारमें? क्रमसे सात्त्विक? राजस और तामस पुरुषोंकी ( पृथक्पृथक् ) रुचि दिखलायी जाती है। वैसे ही सात्त्विक आदि गुणोंके भेदसे यज्ञादिके भेदोंका प्रतिपादन भी यहाँ इसीलिये किया जाता है कि राजस और तामस यज्ञादिको जानकर किसी प्रकार लोग उनका त्याग कर दें और सात्त्विक यज्ञादिका अनुष्ठान किया करें --, भोजन करनेवाले सभी मनुष्योंको तीन प्रकारके आहार प्रियरुचिकर होते हैं। वैसे ही यज्ञ? तप और दान भी ( तीनतीन प्रकारके होते हैं ) उन आहारादिका यह आगे कहा जानेवाला भेद सुन।