Sbg 17.6 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।17.6।।वे अविवेकी मनुष्य? शरीरमें स्थित इन्द्रियादि करणोंके रूपमें परिणत भूतसमुदायको और शरीरके भीतर अन्तरात्मारूपसे स्थित? उनके कर्म और बुद्धिके साक्षी? मुझ ईश्वरको भी? कृश ( तंग ) करते हुए -- मेरी आज्ञाको न मानना ही मुझे कृश करना है? इस प्रकार मुझे कृश करते हुए ( घोर तप करते हैं ) उनको तू आसुरी निश्चयवाले जान। जिनका असुरोंकासा निश्चय हो? वे आसुरी निश्चयवाले कहलाते हैं। उनका सङ्ग त्याग करनेके लिये तू उनको जान? यह उपदेश है।