Sbg 17.5 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।17.5।।इस प्रकार कार्यसे जिनकी सात्त्विकादि निष्ठाओंका निर्णय किया गया है उन ( स्वाभाविक श्रद्धावाले ) हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही शास्त्रविधिका त्याग होनेपर देवपूजादिके परायण? सात्त्विक निष्ठायुक्त होता है। अधिकांश मनुष्य तो राजसी और तामसी निष्ठावाले ही होते हैं। कैसे ( सो कहा जाता है -- )


जो मनुष्य? शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है ऐसा? अशास्त्रविहित और घोर अर्थात् अन्य प्राणियोंको और अपने शरीरको भी पीड़ा पहुँचानेवाला? तप? दम्भ और अहंकार -- इन दोनोंसे युक्त होकर तथा कामना और आसक्तिजनित बलसे युक्त होकर? अथवा कामना? आसक्ति और बलसे युक्त होकर तपते हैं।