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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.17।।और वे अपने आपको सर्वगुणसम्पन्न मानकर? आप ही अपनेको बड़ा माननेवाले? साधु पुरुषोंद्वारा श्रेष्ठ न माने हुए? स्तब्ध -- विनयरहित? धनमानमदान्वित -- धनहेतुक मान और मदसे युक्त पुरुष? पाखण्डसे? अर्थात् धर्मध्वजीपनसे? अविधिपूर्वक -- विहित अंगकी कर्तव्यताके ज्ञानसे रहित केवल नाममात्रके यज्ञोंद्वारा पूजन किया करते हैं।