Sbg 16.16 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.16।।उपर्युक्त अनेक प्रकारके विचारोंसे भ्रान्तचित्त हुए और मोहरूप जालमें फँसे हुए? अर्थात् अविवेक ही मोह है? वह जालकी भाँति फँसानेवाला होनेसे जाल है? उसमे फँसे हुए? तथा विषय भोगोंमें अत्यन्त आसक्त हुए -- उन्हींमें गहरे डूबे हुए मनुष्य? उन भोगोंके द्वारा पापोंका सञ्चय करके? वैतरणी आदि अशुद्ध नरकोंमें गिरते हैं।