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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.12।।तथा सैकड़ों आशारूप पाशोंसे बँधे हुएजकड़े हुए? सब ओरसे खींचे जाते हुए? काम क्रोधके परायण हुए अर्थात् कामक्रोध ही जिनका परम अयन -- आश्रय है? ऐसे काम क्रोधपरायण पुरुष? धर्मके लिये नहीं? बल्कि भोग्य वस्तुओंका भोग करनेके लिये? अन्यायपूर्वक अर्थात् दूसरेका सत्त्व हरण करना आदि अनेक पापमय युक्तियोंद्वारा धनसमुदायको इकट्ठा करनेकी चेष्टा किया करते हैं।
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