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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.8।।तथा --, वे आसुर स्वभाववाले मनुष्य कहा करते हैं कि जैसे हम झूठसे भरे हुए हैं? वैसे ही यह सारा संसार भी झूठा और प्रतिष्ठारहित है? अर्थात् धर्मअधर्म आदि इसका कोई आधार नहीं है? अतः निराधार है तथा अनीश्वर है? अर्थात् पुण्यपापकी अपेक्षासे इसका शासन करनेवाला कोई स्वामी नहीं है? अतः यह जगत् बिना ईश्वरका है। तथा कामसे प्रेरित हुए स्त्रीपुरुषोंका आपसमें संयोग हो जानेसे ही सारा जगत् उत्पन्न हुआ है? अतः इस जगत्का कारण काम ही है? दूसरा और क्या हो सकता है अर्थात् ( इसका ) धर्मअधर्मादि कोई दूसरा अदृष्ट कारण नहीं है? केवल काम ही प्राणियोंका कारण है। यह लोकायतिकों की दृष्टि है।