Sbg 16.5 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.5।।इन दोनों सम्पत्तियोंका कार्य बतलाया जाता है --, जो दैवी सम्पत्ति है? वह तो संसारबन्धनसे मुक्त करनेके लिये है? तथा आसुरी और राक्षसी सम्पत्ति निःसन्देह बन्धनके लिये मानी गयी है। निश्चित बन्धनका नाम निबन्ध है? उसके लिये मानी गयी है। इतना कहनेके उपरान्त अर्जुनके अन्तःकरणमें यह संशययुक्त विचार उत्पन्न हुआ देखकर? कि क्या मैं आसुरी सम्पत्तिसे युक्त हूँ अथवा दैवी सम्पत्तिसे भगवान् बोले -- हे पाण्डव शोक मत कर? तू दैवी सम्पत्तिको लेकर उत्पन्न हुआ है। अर्थात् भविष्यमें तेरा कल्याण होनेवाला है।