Sbg 16.2 htshg

From IKS BHU
Revision as of 15:22, 4 December 2025 by imported>Vij (Added {content_identifier} content)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।16.2।।तथा --, अहिंसा -- किसी भी प्राणीको कष्ट न देना? सत्यअप्रियता और असत्यसे रहित यथार्थ वचन। अक्रोध -- दूसरोंके द्वारा गाली दी जाने या ताड़ना दी जानेपर उत्पन्न हुए क्रोधको शान्त कर लेना। त्याग -- संन्यास ( दान नहीं ) क्योंकि दान पहले कहा जा चुका है। शान्ति -- अन्तःकरणका संकल्परहित होना? अपैशुन -- अपिशुनता किसी दूसरेके सामने पराये छिद्रोंको प्रकट करना पिशुनता ( चुगली ) है? उसका न होना अपिशुनता है। भूतोंपर दया -- दुखी प्राणियोंपर कृपा करना? अलोलुपता -- विषयोंके साथ संयोग होनेपर भी इन्द्रियोंमें विकार न होना? मार्दवकोमलता अर्थात् अक्रूरता। ह्री -- लज्जा और अचपलता -- बिना प्रयोजन वाणी? हाथ? पैर आदिकी व्यर्थ क्रियाओंका न करना।