Sbg 15.16 htshg

From IKS BHU
Revision as of 15:21, 4 December 2025 by imported>Vij (Added {content_identifier} content)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.16।।अब? क्षर और अक्षर -- इन दोनों उपाधियोंसे अलग बतलाकर? उसी उपाधिरहित शुद्ध परमात्माके स्वरूपका निश्चय करनेकी इच्छासे? अगले श्लोकोंका आरम्भ किया जाता है। उनमें पहलेके और आगे आनेवाले सभी अध्यायोंके समस्त अभिप्रायको तीन भेदोंमें विभक्त करके कहते हैं --, समुदायरूपसे पृथक् किये हुए ये दो भाव? संसारमें पुरुष नामसे कहे जाते हैं। इनमेंसे एक समुदाय क्षीण होनेवाला -- नाशवान् क्षर पुरुष है और दूसरा उससे विपरीत अक्षर पुरुष है? जो कि भगवान्की मायाशक्ति है? क्षर पुरुषकी उत्पत्तिका बीज है? तथा अनेक संसारी जीवोंकी कामना और कर्म आदिके संस्कारोंका आश्रय है? वह अक्षर पुरुष कहलाता है। वे दोनों पुरुष कौन हैं सो भगवान् स्वयं ही बतलाते हैं -- समस्त भूत अर्थात् प्रकृतिका सारा विकार तो क्षर पुरुष है और कूटस्थ अर्थात् जो कूट -- राशिकी भाँति स्थित है अथवा कूट नाम मायाका है जिसके वञ्चना? छल? कुटिलता आदि पर्याय हैं? उपर्युक्त माया आदि अनेक प्रकारसे जो स्थित है? वह कूटस्थ है। संसारका बीज? अन्तरहित होनेके कारण वह कूटस्थ नष्ट नहीं होता? अतः अक्षर कहा जाता है।