Sbg 15.13 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.13।।तथा --, मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर अपने उस बलसे? जो कि कामना और आसक्तिसे रहित मेरा ऐश्वर्यबल जगत्को धारण करनेके लिये पृथिवीमें प्रविष्ट है? जिस बलके कारण भारवती पृथिवी नीचे नहीं गिरती और फटती भी नहीं? सारे जगत्को धारण करता हूँ। यही बात वेदमन्त्र भी कहते हैं कि जिससे द्युलोक और भारवती पृथिवी दृढ़ है तथा वह पृथिवीको धारण करता है इत्यादि। अतः यह कहना ठीक ही है कि मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर चराचर समस्त भूतप्राणियोंको धारण करता हूँ। तथा मैं ही रसस्वरूप चन्द्रमा होकर पृथिवीमें उत्पन्न होनेवाली धान? जौ आदि समस्त ओषधियोंका पोषण करता हूँ अर्थात् उनको पुष्ट और स्वादयुक्त किया करता हूँ। जो सब रसोंका आत्मा है? रस ही जिसका स्वभाव है? जो समस्त रसोंकी खानि है वह सोम है? वही अपने रसका सञ्चार करके? समस्त वनस्पतियोंका पोषण किया करता है।