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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.12।।सबको प्रकाशित करनेवाली अग्नि? सूर्य आदि ज्योतियाँ भी जिस परमपदको प्रकाशित नहीं कर सकतीं? जिस परमपदको प्राप्त हुए मुमुक्षुजन फिर संसारकी ओर नहीं लौटते? जैसे घट आदिके आकाश महाकाशके अंश हैं? वैसे ही उपाधिजनित भेदसे विभिन्न हुए जीव? जिस परमपदके ( कल्पितभावसे ) अंश हैं? उस परमपदका? सर्वात्मत्व और समस्त व्यवहारका आधारत्व? बतलानेकी इच्छासे भगवान् चार श्लोकोंद्वारा संक्षेपसे विभूतियोंका वर्णन करते हैं --, जो तेजदीप्ति प्रकाश? सूर्यमें स्थित हुआ अर्थात् सूर्यके आश्रित हुआ समस्त जगत्को प्रकाशित करता है? जो प्रकाश करनेवाला तेज शशाङ्क -- चन्द्रमामें स्थित है और जो अग्निमें वर्तमान है? उस तेजको तू मुझ विष्णुकी अपनी ज्योति समझ। अथवा जो तेज यानी चैतन्यमय ज्योति? सूर्यमें स्थित है? तथा जो चन्द्रमा और अग्निमें स्थित है? उस तेजको तू मुझ विष्णुकी स्वकीय ( चेतनमयी ) ज्योति समझ। पू 0 -- वह चेतनमयी ज्योति तो चराचर? सभी पदार्थोंमें समानभावसे स्थित है? फिर यह विशेषता कैसे बतलायी कि जो तेज सूर्यमें स्थित है इत्यादि। उ 0 -- सत्त्व -- स्वच्छताकी अधिकतासे उनमें अधिकता सम्भव होनेके कारण यह दोष नहीं है क्योंकि सूर्य आदिमें सत्त्वअत्यन्त प्रकाश अत्यन्त स्वच्छता है? अतः उनमें ही ब्रह्मज्योति अत्यन्त प्रत्यक्ष प्रतिभासित होती है? इसीसे उनकी विशेषता बतलायी गयी है। यह बात नहीं कि वहीं कुछ बह्मज्योति अधिक है। जैसे संसारमें देखा जाता है कि समान भावसे सम्मुखसामने स्थित होनेपर भी? काष्ठ या भित्ति आदिमें मुखका प्रतिबिम्ब नहीं दीखता? पर दर्पण आदि पदार्थमें? जो जितना स्वच्छ और स्वच्छतर होता है उसमें उसी तारतम्यसे? स्वच्छ और स्वच्छतर दीखता है? वैसे ही ( इस विषयमें समझो )।