Sbg 15.5 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.5।।उस परमपदको कैसे पुरुष प्राप्त करते हैं सो कहते हैं --, जो मानमोहसे मुक्त हैं -- जिनका अभिमान और अज्ञान नष्ट हो गया है? ऐसे जो मानमोह से रहित हैं? जो,जितसङ्गदोष हैं -- जिन्होंने आसक्तिरूप दोषको जीत लिया है? जो नित्य अध्यात्मविचारमें लगे हुए हैं -- सदा परमात्माके स्वरूपकी आलोचना करनेमें तत्पर हैं? जो कामनासे रहित हैं -- जिनकी समस्त कामनाएँ निर्लेपभावसे ( मूलसहित ) निवृत्त हो गयी हैं? ऐसे यति -- संन्यासी जो कि सुखदुःख नामक प्रिय और अप्रिय आदि द्वन्द्वोंसे छूटे हुए हैं? वे मोहरहित ज्ञानी? उस उपर्युक्त अविनाशी पदको पाते हैं।