Sbg 15.4 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.4।।उसके पश्चात् उस परम वैष्णवपदको खोजना चाहिये अर्थात् जानना चाहिये कि जिस पदमें पहुँचे हुए पुरुष? फिर संसारमें नहीं लौटते -- पुनर्जन्म ग्रहण नहीं करते। ( उस पदको ) कैसे खोजना चाहिये सो कहते हैं -- जो पदशब्दसे कहा गया है? उसी आदिपुरुषकी मैं शरण हूँ? इस भावसे अर्थात् उसके शरणागत होकर खोजना चाहिये। वह पुरुष कौन है? सो बतलाते हैं -- जिस पुरुषसे बाजीगरकी मायाके समान इस मायारचित संसारवृक्षकी सनातन प्रवृत्ति विस्तारको प्राप्त हुई है -- प्रकट हुई है।