Sbg 15.3 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.3।।यह जो वर्णन किया हुआ संसारवृक्ष है --, इसका स्वरूप जैसा यहाँ वर्णन किया गया है? वैसा उपलब्ध नहीं होता क्योंकि यह स्वप्नकी वस्तु? मृगतृष्णाके जल और मायारचित गन्धर्वनगरके समान होनेसे? देखतेदेखते नष्ट होनेवाला है। इसी कारण इसका अन्त अर्थात् अन्तिमावस्थाअवसान या समाप्ति भी नहीं है। तथा इसका आदि भी नहीं है? अर्थात् यहाँसे आरम्भ होकर यह संसार चला है? ऐसा किसीसे नहीं जाना जा सकता और इसकी संप्रतिष्ठास्थिति भी नहीं है यानी आदि और अन्तके बीचकी अवस्था भी किसीको उपलब्ध नहीं होती। इस उपर्युक्त सुविरूढमूल यानी जिसकी मूलें -- जड़ें अत्यन्त दृढ़ हो गयी हैं -- भली प्रकार संगठित हो चुकी हैं? ऐसे संसाररूप अश्वत्थको? असङ्गशस्त्रसे छेदन करके यानी पुत्रैषणा? वित्तैषणा और लोकैषणादिसे उपराम हो जाना ही असङ्ग है? ऐसे असङ्गशस्त्रसे जो कि परमात्माके सम्मुख होनारूप निश्चयसे दृढ़ किया हुआ है और बारंबार विवेकाभ्यासरूप पत्थरपर घिसकर पैना किया हुआ है? इस संसारवृक्षको बीजसहित उखाड़कर।