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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।15.2।।अपने उपादानकारणरूप सत्त्व? रज और तमइन तीनों गुणोंसे बढ़ी हुई -- स्थूलभावको प्राप्त हुई और विषयरूपी कोंपलोंवाली? उस वृक्षकी बहुतसी शाखाएँ? जो कि अपनेअपने कर्म और ज्ञानके अनुरूप -- कर्म और ज्ञानकी फलस्वरूपा योनियाँ हैं? नीचेकी ओर मनुष्योंसे लेकर स्थावरपर्यन्त और ऊपरकी ओर धर्म यानी विश्वकर्ता ब्रह्मापर्यन्त? वृक्षकी शाखाओंके समान फैली हुई हैं। कर्मफलरूप देहादि शाखाओंसे शब्दादि विषय? कोंपलोंके समान अङ्कुरितसे होते हैं? इसलिये वे शरीरादिरूप शाखाएँ विषयरूपी कोंपलोंवाली हैं। संसारवृक्षका परम मूल -- उपादानकारण पहले बतलाया जा चुका है। अब कर्मफलजनित रागद्वेष आदिकी वासनाएँ जो मूलके समान धर्माधर्मविषयक प्रवृत्तिका कारण और अवान्तरसे ( आगेपीछे ) होनेवाली हैं ( उनको कहते हैं )। वे मनुष्यलोकमें कर्मानुबन्धिनी वासनारूप मूलें देवादिकी अपेक्षा नीचे भी? अविच्छिन्नरूपसे फैली हुई हैं। पुण्यपापरूप कर्म जिनका अनुबन्ध यानी पीछेपीछे होनेवाला है? अर्थात् जिनकी उत्पत्तिका अनुवर्तन करनेवाला है? वे कर्मानुबन्धी कहलाती हैं। यहाँ मनुष्योंका ही विशेषरूपसे कर्ममें अधिकार प्रसिद्ध है ( इसलिये वे मूलें मनुष्यलोकमें कर्मानुबन्धिनी बतलायी गयी हैं )।