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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।14.27।।ऐसा क्यों होता है सो बतलाते हैं --, क्योंकि ब्रह्म -- परमात्माकी प्रतिष्ठा मैं हूँ। जिसमें प्रतिष्ठित हो वह प्रतिष्ठा है? इस व्युत्पत्तिके अनुसार मैं अन्तरात्मा ( ब्रह्मकी ) प्रतिष्ठा हूँ। कैसे ब्रह्मकी ( सो कहते हैं -- ) जो अमृत -- अविनाशी? अव्यय -- निर्विकार? शाश्वत -- नित्य? धर्मस्वरूप -- ज्ञानयोगरूप धर्मद्वारा प्राप्तव्य और ऐकान्तिक सुखस्वरूप अर्थात् व्यभिचाररहित आनन्दमय है उस ब्रह्मकी मैं प्रतिष्ठा हूँ। अमृत आदि स्वभाववाले परमात्माकी प्रतिष्ठा अन्तरात्मा ही है क्योंकि यथार्थ ज्ञानसे वही परमात्मारूपसे निश्चित होता है। यही बात ब्रह्मभूयाय कल्पते इस पदसे कही गयी है। अभिप्राय यह है कि जिस ईश्वरीय शक्तिसे भक्तोंपर अनुग्रह आदि करनेके लिये ब्रह्म प्रवर्तित होता है? वह शक्ति? मैं ब्रह्म ही हूँ क्योंकि शक्ति और शक्तिमान्में भेद नहीं होता। अथवा ( ऐसा समझना चाहिये कि ) ब्रह्मशब्दका वाच्य होनेके कारण यहाँ सगुण ब्रह्मका ग्रहण है? उस सगुण ब्रह्मका मैं निर्विकल्प -- निर्गुण ब्रह्म ही प्रतिष्ठा -- आश्रय हूँ? दूसरा कोई नहीं। किन विशेषणोंसे युक्त सगुण ब्रह्मका जो अमृत अर्थात् मरणधर्मसे रहित है और अविनाशी अर्थात् क्षय होनेसे रहित है? उसका। तथा ज्ञाननिष्ठारूप शाश्वतनित्य धर्मका और उससे होनेवाले ऐकान्तिक एकमात्र निश्चित परम आनन्दका भी? मैं ही आश्रय हूँ। अहं प्रतिष्ठा यह पद यहाँ अनुवृत्तिसे लिया गया है।