Sbg 13.35 htshg
Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.35।।सारे अध्यायके अर्थका उपसंहार करनेके लिये यह श्लोक ( कहा जाता है ) --, जो पुरुष शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न आत्मसाक्षात्काररूप ज्ञाननेत्रोंद्वारा? पहले बतलाये हुए क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तरको? -- उनकी पारस्परकि विलक्षणताको? इस पूर्वदर्शित प्रकारसे जान लेते हैं? और वैसे ही अव्यक्त नामक अविद्यारूप भूतोंकी प्रकृतिके मोक्षको? यानी उसका अभाव कर देनेको भी जानते हैं? वे परमार्थतत्त्वस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं? पुनर्जन्म नहीं पाते।