Sbg 13.29 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.29।।उपर्युक्त यथार्थ ज्ञानका फल बतलाकर उसकी स्तुति करनी चाहिये। इसलिये यह श्लोक आरम्भ किया जाता है --, क्योंकि सर्वत्र -- सब भूतोंमें समभावसे स्थित हुए ईश्वरको अर्थात् ऊपरके श्लोकमें जिसके लक्षण बतलाये गये हैं? उस ( परमेश्वर ) को सर्वत्र समान भावसे देखनेवाला पुरुष स्वयं -- अपने आप अपनी हिंसा नहीं करता? इसलिये अर्थात् अपनी हिंसा न करनेके कारण वह मोक्षरूप परम उत्तम गतिको प्राप्त होता है। पू 0 -- कोई भी प्राणी स्वयं अपनी हिंसा नहीं करता फिर यह अप्राप्तका निषेध क्यों किया जाता है कि वह अपनी हिंसा नहीं करता जैसे कोई कहे कि पृथ्वीपर और अन्तरिक्षमें अग्नि नहीं जलानी चाहिये। उ 0 -- यह दोष नहीं है क्योंकि अज्ञानियोंसे स्वयं अपना तिरस्कार करना बन सकता है। सभी अज्ञानी अत्यन्त प्रसिद्ध साक्षात् -- प्रत्यक्ष आत्माका तिरस्कार करके अनात्मा शरीरादिको आत्मा मानकर? फिर धर्म और अधर्मका आचरण कर? उस प्राप्त किये हुए ( शरीररूप ) आत्माका नाश करके दूसरे नये ( शरीररूप ) आत्माको प्राप्त करते हैं। फिर उसका भी इसी प्रकार नाश करके अन्यको और उसका भी वैसे ही नाश करके ( पुनः ) अन्यको पाते रहते हैं। इस प्रकार बारंबार शरीररूप आत्माको प्राप्त करके उसकी हिंसा करते जाते हैं? अतः सभी अज्ञानी आत्महत्यारे हैं। जो वास्तवमें आत्मा है वह भी अविद्याद्वारा ( अज्ञात होनेके कारण ) सदा मारा हुआसा ही रहता है क्योंकि उनके लिये उसका विद्यमान फल भी नहीं होता। सुतरां अभी अविद्वान् आत्माकी हिंसा करनेवाले ही हैं। परंतु जो इनसे अन्य उपर्युक्त आत्मस्वरूपको जाननेवाला है? वह दोनों प्रकारसे ही अपनेद्वारा अपना नाश नहीं करता है। इसलिये वह परमगति प्राप्त कर लेता है अर्थात् उसे पहले बताया हुआ ( परम गतिरूप ) फल प्राप्त होता है।