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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.26।।अन्य कई एक साधकजन उपर्युक्त विकल्पोंमेंसे किसी एकके भी द्वारा पूर्वोक्त आत्मतत्त्वको न जानते हुए अन्य आचार्योंसे सुनकर -- उनकी ऐसी आज्ञा पाकर कि तुम इसीका चिन्तन किया करो उपासना करते हैं -- श्रद्धापूर्वक चिन्तन करते हैं। वे केवल सुननेके परायण हुए पुरुष भी अर्थात् जिनके मतमें श्रवण करना ही मोक्षमार्गसम्बन्धी प्रवृत्तिमें परम आश्रय -- गति? परम साधन है? ऐसे केवल अन्य आचार्योंके उपदेशको ही प्रमाण माननेवाले? स्वयं विवेकहीन श्रुतिपरायण पुरुष भी मृत्युको यानी मृत्युयुक्त संसारको निःसंन्देह पार कर जाते हैं। फिर प्रमाण करनेमें जो स्वतन्त्र हैं वे विवेकी पुरुष मृत्युयुक्त संसारसे तर जाते हैं? इसमें तो कहना ही क्या है यह अभिप्राय है।
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