Sbg 13.23 htshg

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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.23।।उसीका फिर साक्षात् निर्देश किया जाता है --, ( यह आत्मा ) उपद्रष्टा है अर्थात् स्वयं क्रिया न करता हुआ पासमें स्थित होकर देखनेवाला है। जैसे कोई यज्ञविद्यामें कुशल अन्य पुरुष स्वयं यज्ञ न करता हुआ? यज्ञकर्ममें लगे हुए पुरोहित और यजमानोंद्वारा किये हुए कर्मसम्बन्धी गुणदोषोंको तटस्थभावसे देखता है? उसी प्रकार कार्य और करणोंके व्यापारमें स्वयं न लगा हुआ उनसे अन्यविलक्षण आत्मा उन व्यापारयुक्त कार्य और करणोंको समीपस्थ भावसे देखनेवाला है। अथवा देह? चक्षु? मन? बुद्धि और आत्मा -- ये सभी द्रष्टा हैं? उनमें बाह्य द्रष्टा शरीर है और उससे लेकर उन सबकी अपेक्षा अन्तरतम -- समीपस्थ द्रष्टा अन्तरात्मा है। जिसकी अपेक्षा और कोई आन्तरिक द्रष्टा न हो? वह अतिशय सामीप्य भावसे देखनेवाला होनेके कारण उपद्रष्टा होता है ( अतः आत्मा उपद्रष्टा है )। अथवा ( यों समझो कि ) यज्ञके उपद्रष्टाकी भाँति सबका अनुभव करनेवाला होनेसे आत्मा उपद्रष्टा है। तथा यह अनुमन्ता है -- क्रिया करनेमें लगे हुए अन्तःकरण और इन्द्रियादिकी क्रियाओंमें सन्तोषरूप अनुमोदनका नाम अनुमनन है? उसका करनेवाला है। अथवा यह इसीलिये अनुमन्ता है कि कार्यकरणकी प्रवृत्तिमें स्वयं प्रवृत्त न होता हुआ भी उनके अनुकूल प्रवृत्त हुआ सा दीखता है। अथवा अपने व्यापारमें लगे हुए अन्तःकरण और इन्द्रियादिको उनका साक्षी होकर भी कभी निवारण नहीं करता? इसलिये अनुमन्ता है। तथा यह भर्ता है? चैतन्यस्वरूप आत्माके भोग और अपवर्गकी सिद्धिके निमित्तसे संहत हुए चेतन्यके आभासरूप शरीर? इन्द्रिय? मन और बुद्धि आदिका स्वरूप धारण करना भी भरण है और वह चैतन्यरूप आत्माका ही किया हुआ है? इसलिये आत्माको भर्ता कहते हैं। आत्मा भोक्ता है। अग्निके उष्णत्वकी भाँति नित्यचैतन्य आत्मसत्तासे समस्त विषयोंमें पृथक्पृथक् होनेवाली जो बुद्धिकी सुखदुःख और मोहरूप प्रतीतियाँ हैं? वे सब चैतन्य आत्माद्वारा ग्रस्त की हुईसी दीखती हैं? अतः आत्माको भोक्ता कहा जाता है। आत्मा महेश्वर है। वह सबका आत्मा होनेके कारण और स्वतन्त्र होनेके कारण महान् ईश्वर है? इसलिये महेश्वर है। वह परमात्मा है। अविद्याद्वारा प्रत्यक् आत्मारूप माने हुए जो शरीरसे लेकर बुद्धिपर्यन्त ( आत्मशब्दवाच्य पदार्थ ) हैं। उन सबसे उपद्रष्टा आदि लक्षणोंवाला आत्मा परम ( श्रेष्ठ ) है -- इसलिये वह परमात्मा है। श्रुतिमें भी वह भीतर व्यापक परमात्मा है इन शब्दोंसे उसका वर्णन किया गया है। ऐसा आत्मा कहाँ है वह अव्यक्तसे पर पुरुष इसी शरीरमें है जो कि उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः इस प्रकार आगे कहा जायगा और जो क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि इस प्रकार पहले कहा जा चुका है तथा जिसकी व्याख्या करके उपसंहार किया गया है।