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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.11।।तथा --, मुझ ईश्वरमें अनन्य योगसे -- एकत्वरूप समाधियोगसे अव्यभिचारिणी भक्ति। भगवान् वासुदेवसे पर अन्य कोई भी नहीं है? अतः वही हमारी परमगति है? इस प्रकारकी जो निश्चित अविचल बुद्धि है वही अनन्य योग है? उससे युक्त होकर भजन करना ही कभी विचलित न होनेवाली अव्यभिचारिणी भक्ति है? वह भी ज्ञान है। विविक्तदेशसेवित्व -- एकान्त पवित्रदेश -- सेवनका स्वभाव। जो देश स्वभावसे पवित्र हो या झाड़नेबुहारने,आदि संस्कारोंसे शुद्ध किया गया हो तथा सर्पव्याघ्र आदि जन्तुओंसे रहित हो? ऐसे वन? नदी तीर या देवालय आदि विविक्त ( एकान्तपवित्र ) देशको सेवन करनेका जिसका स्वभाव है? वह विविक्तदेशसेवी कहलाता है? उसका भाव विविक्तदेशसेवित्व है। क्योंकि निर्जनपवित्र देशमें ही चित्त प्रसन्न और स्वच्छ होता है? इसलिये विविक्तदेशमें आत्मादिकी भावना प्रकट होती है? अतः विविक्तदेश सेवन करनेके स्वभावको ज्ञान कहा जाता है। तथा जनसमुदायमें अप्रीति। यहाँ विनयभावरहित संस्कारशून्य प्राकृत पुरुषोंके समुदायका नाम ही जनसमुदाय है। विनययुक्त संस्कारसम्पन्न मनुष्योंका समुदाय जनसमुदाय नहीं है क्योंकि वह तो ज्ञानमें सहायक है। सुतरां प्राकृतजनसमुदायमें प्रीतिका अभाव ज्ञानका साधन होनेके कारण ज्ञान है।