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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।13.10।।तथा --, असक्ति -- आसत्तिनिमित्तक विषयोंमें प्रीतिमात्रका नाम सक्ति है? उसका अभाव। अनभिष्वंग -- अभिष्वगंका अभाव। मोहपूर्वक अनन्य आत्मभावनारूप जो विशेष आसक्ति है उसका नाम अभिष्वंग है। जैसे दूसरेके सुखी या दुःखी होनेपर यह मानना कि मैं ही सुखीदुःखी हूँ। अथवा किसी अन्यके जीनेमरनेपर मैं ही जीता हूँ या मर जाऊँगा? ऐसा मानना। ( ऐसा अभिष्वंग ) कहाँ होता है ( सो कहते हैं ) पुत्र? स्त्री और घर आदिमें अर्थात् पुत्रमें? स्त्रीमें? घरमें तथा आदि शब्दका ग्रहण होनेसे अन्य जो कोई दासवर्ग आदि अत्यन्त प्रिय होते हैँ उनमें भी। असक्ति और अनभिष्वंग ये दोनों ही ज्ञानके साधन हैं? इसलिये इनको भी ज्ञान कहते हैं। तथा नित्य समचित्तता अर्थात् निरन्तर चित्तकी समानता -- किसमें इष्ट अथवा अनिष्टकी प्राप्तिमें? अर्थात् प्रिय और अप्रियकी जो बारंबार प्राप्ति होती रहती है उसमें सदा ही चित्तका सम रहना। इस साधनवाला प्रियकी प्राप्तिमें हर्षित नहीं होता और अप्रियकी प्राप्तिमें क्रोधयुक्त नहीं होता। इस प्रकारकी जो चित्तकी नित्य समता है वह भी ज्ञान है।