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अविज्ञाततत्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः मूहस्तर्कः 1/1/40
संधि विच्छेद:
- अविज्ञाततत्वे + अर्थे + कारणोपपत्तितः + तत्त्वज्ञानार्थम् + मूहस्तर्कः + मूहस्तर्कः।
पदच्छेद और अर्थ:
- अविज्ञाततत्वे:
- अविज्ञात (अज्ञात) + तत्वे (तत्त्व - तत्व/सत्य) = उस तत्व (वस्तु या तथ्य) में जो अभी तक ज्ञात नहीं है।
- अर्थ: अज्ञात या अदृश्य तथ्य में।
- अर्थे:
- अर्थ (सार्थकता, उद्देश्य) + ए (सप्तमी विभक्ति) = उस अर्थ में।
- अर्थ: किसी उद्देश्य या सार्थकता के संदर्भ में।
- कारणोपपत्तितः:
- कारण (साधारण कारण) + उपपत्ति (प्रमाण) + इतः (सप्तमी विभक्ति) = प्रमाण के आधार पर कारण का सिद्ध होना।
- अर्थ: जब किसी तथ्य का कारण प्रमाणित किया जाता है।
- तत्त्वज्ञानार्थम्:
- तत्त्व (वास्तविकता, सत्य) + ज्ञान (ज्ञान) + अर्थम् (लक्ष्य) = तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से।
- अर्थ: सत्य या तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए।
- मूहस्तर्कः:
- मूह (भ्रांति, भ्रम) + तर्क (तर्क या तात्पर्य) = भ्रमपूर्ण तर्क।
- अर्थ: ऐसा तर्क जो भ्रम या गलत धारणा से भरा हो।
- मूहस्तर्कः:
- पुनः वही वाक्य, जिसका अर्थ पहले जैसा है।
- अर्थ: पुनः भ्रमपूर्ण तर्क।
पूरा अर्थ:
"अविज्ञाततत्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः मूहस्तर्कः" का अर्थ है:
"जब किसी अज्ञात तथ्य का कारण प्रमाणित किया जाता है, तो उस सत्य के ज्ञान के लिए किया गया भ्रमपूर्ण तर्क वही भ्रमपूर्ण तर्क होता है।"
व्याख्या:
यह वाक्यांश न्याय शास्त्र में मूहस्तर्क या भ्रमपूर्ण तर्क को स्पष्ट करने से संबंधित है।
- जब किसी अविज्ञात (अज्ञात) या अज्ञेय तत्त्व (अभी तक न पहचाना गया तथ्य) का कारण प्रमाणित किया जाता है, तो तत्त्वज्ञान (सत्य का ज्ञान प्राप्त करना) के लिए मूहस्तर्क किया जाता है।
- यह भ्रमपूर्ण तर्क (जो गलत निष्कर्ष पर आधारित होता है) बार-बार किया जाता है।
- इसका उद्देश्य यह दर्शाना है कि जब किसी तथ्य का ज्ञान प्रमाणित नहीं हो सकता, तो इसके लिए भ्रमपूर्ण तर्क या सापेक्ष प्रमाण का सहारा लिया जाता है।
उदाहरण सहित विवरण:
मान लीजिए कि कोई व्यक्ति यह तर्क देता है:
"पानी में आग नहीं है, लेकिन जलने से भी कुछ गर्मी आती है, तो इसका कारण जलने के बीच उत्पन्न हुआ पदार्थ है।"
यह मूहस्तर्क है, क्योंकि इसे असल कारण से जोड़ने में गलती की गई है। यहाँ जलन के पीछे का असली कारण (आग) नहीं देखा जा रहा है।
महत्व:
- मूहस्तर्क का उद्देश्य भ्रम पैदा करना है, जिसे ग़लत और अव्याख्येय तर्क के रूप में देखा जाता है।
- यह वाक्यांश हमें यह समझाता है कि जब कोई तथ्य अज्ञात होता है और उसका प्रमाण सशक्त नहीं होता, तब भ्रमपूर्ण तर्क का सहारा लिया जाता है।
- तत्त्वज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से, इस तरह के भ्रमपूर्ण तर्क से बचना आवश्यक होता है।
सारांश:
"अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः मूहस्तर्कः" का अर्थ है:
"जब किसी अज्ञात तत्व का कारण प्रमाणित किया जाता है, तो सत्य के ज्ञान के उद्देश्य से किए गए भ्रमपूर्ण तर्क वही भ्रमपूर्ण तर्क होते हैं।"
यह वाक्य भ्रमपूर्ण तर्क और उसके कारणों को स्पष्ट करने के लिए न्याय तर्कशास्त्र में महत्वपूर्ण है।