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तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम् 1/1/37


संधि विच्छेद:

  • तत् + विपर्ययात् + वा + विपरीतम्।

पदच्छेद और अर्थ:

  1. तत्:
    • अर्थ: वह (जिसका पहले उल्लेख किया गया है)।
    • संदर्भ: यहाँ "तत्" का तात्पर्य साध्य, धर्म, या तर्क से है।
  2. विपर्ययात्:
    • विपर्यय (विपरीतता, उल्टा) + आत् (पंचमी विभक्ति) = विपरीतता के आधार पर।
    • अर्थ: असमानता, विपरीत गुण।
  3. वा:
    • अर्थ: या।
    • संदर्भ: एक वैकल्पिक स्थिति का उल्लेख।
  4. विपरीतम्:
    • अर्थ: विपरीत, उल्टा।
    • संदर्भ: ऐसा जो विपरीत गुण को दर्शाता हो।

पूरा अर्थ:

"तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम्" का अर्थ है:

"या उसके विपरीत के कारण विपरीत स्थिति उत्पन्न होती है।"


व्याख्या:

यह वाक्यांश न्याय दर्शन में विपरीतता (वैधर्म्य) के आधार पर किसी निष्कर्ष को स्पष्ट करने का तात्पर्य देता है।

  • तर्क में यदि किसी गुण (साध्य) का अभाव सिद्ध हो, तो उसका कारण (हेतु) भी अनुपस्थित होगा।
  • इस प्रकार, विपरीत गुणों या स्थितियों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है।

उदाहरण सहित विवरण:

तर्क: "पर्वतो वह्निमान् धूमवत्त्वात्।"

(पहाड़ में आग है क्योंकि वहाँ धुआँ है।)

  1. साध्य: "वह्निमान्" (आग होना)।
  2. हेतु: "धूमवत्त्व" (धुआँ होना)।
  3. विपर्यय (वैधर्म्य):
    • जहाँ धुआँ नहीं होता, वहाँ आग भी नहीं होती।
    • उदाहरण: "यथा सरसि।" (जैसे तालाब में न धुआँ है और न आग है।)

वैधर्म्य से विपरीत सिद्धि:

यदि किसी स्थान में साध्य (आग) और उसके हेतु (धुआँ) का अभाव है, तो वह तर्क विपरीत सिद्धांत को पुष्ट करता है।


महत्व:

  1. विपरीत गुणों के आधार पर तर्क को संतुलित और सशक्त बनाने का यह एक विधि है।
  2. यह तर्क की नकारात्मक पुष्टि (negative confirmation) को दर्शाता है।
  3. न्याय दर्शन में यह दृष्टिकोण उपयोगी है जब सकारात्मक प्रमाण अपर्याप्त हो।

सारांश:

"तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम्" का अर्थ है:

"या उसके विपरीत के आधार पर विपरीत स्थिति की पुष्टि की जाती है।"

यह विपरीत गुणों के आधार पर तर्क प्रक्रिया का हिस्सा है।