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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।12.12।।अब सर्व कर्मोंके फलत्यागकी स्तुति करते हैं --, निःसंन्देह ज्ञान श्रेष्ठतर है। किससे अविवेकपूर्वक किये हुए अभ्याससे उस ज्ञानसे भी ज्ञानपूर्वक ध्यान श्रेष्ठ है? और ( इसी प्रकार ) ज्ञानयुक्त ध्यानसे भी कर्मफलका त्याग अधिक श्रेष्ठ है। पहले बतलाये हुए विशेषणोंसे युक्त पुरुषको इस कर्मफलत्यागसे तुरंत ही शान्ति हो जाती है? अर्थात् हेतुसहित समस्त संसारकी निवृत्ति तत्काल ही हो जाती है। कालान्तरकी अपेक्षा नहीं रहती। कर्मोंमें लगे हुए अज्ञानीके लिये? पूर्वोक्त उपायोंका अनुष्ठान करनेमें असमर्थ होनेपर ही? सर्वकर्मोंके फलत्यागरूप कल्याणसाधनका उपदेश किया गया है? सबसे पहले नहीं। इसलिये श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् इत्यादिसे उत्तरोत्तर श्रेष्ठता बतलाकर सर्वकर्मोंके फलत्यागकी स्तुति करते हैं क्योंकि उत्तम साधनोंका अनुष्ठान करनेमें असमर्थ होनेपर यह साधन भी अनुष्ठान करने योग्य माना गया है। पू 0 -- कौनसी समानताके कारण यह स्तुति की गयी हैं उ 0 -- जब ( इसके हृदयमें स्थित ) समस्त कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं इस श्रुतिसे समस्त कामनाओंके नाशसे अमृतत्वकी प्राप्ति बतलायी गयी है? यह प्रसिद्ध है। समस्त श्रौतस्मार्तकर्मोंके फलोंका नाम काम है? उनके त्यागसे ज्ञाननिष्ठ विद्वान्को तुरंत ही शान्ति मिलती है।अज्ञानीके कर्मफलत्यागमें भी सर्व कामनाओंका त्याग है ही? अतः इस सर्व कामनाओंके त्यागकी समानताके कारण रुचि उत्पन्न करनेके लिये यह सर्वकर्मफलत्यागकी स्तुति की गयी। जैसे अगस्त्य ब्राह्मणने समुद्र पी लिया था इसलिये आजकलके ब्राह्मणोंके भी ब्राह्मणत्वकी समानताके कारण स्तुति की जाती है। इस प्रकार कर्मफलके त्यागसे कर्मयोगकी कल्याणसाधनता बतलायी गयी है। यहाँ आत्मा और ईश्वरके भेदको स्वीकार करके विश्वरूप ईश्वरमें चित्तका समाधान करनारूप योग कहा है और ईश्वरके लिये कर्म करने आदिका भी उपदेश किया है। परंतु अथैतदप्यशक्तोऽसि इस कथनके द्वारा ( कर्मयोगको ) अज्ञानका कार्य सूचित करते हुए भगवान् यह दिखलाते हैं कि जो अव्यक्त अक्षरकी उपासना करनेवाले अभेददर्शी हैं उनके लिये कर्मयोग सम्भव नहीं है। साथ ही कर्मयोगियोंके लिये अक्षरकी उपासना असम्भव दिखलाते हैं। इसके सिवाय ( उन्होंने ) ते प्राप्नुवन्ति मामेव इस कथनसे अक्षरकी उपासना करनेवालोंके लिये मोक्षप्राप्तिमें स्वतन्त्रता बतलाकर तेषामहं समुद्धर्ता इस कथनसे दूसरोंके लिये परतन्त्रता अर्थात् ईश्वराधीनता दिखलायी है। क्योंकि यदि वे ( कर्मयोगी भी ) ईश्वरके स्वरूप ही माने गये हैं तब तो अभेददर्शी होनेके कारण वे अक्षरस्वरूप ही हुए? फिर उनके लिये उद्धार करनेका कथन असंगत होगा। भगवान् अर्जुनके अत्यन्त ही हितैषी हैं? इसलिये उसको सम्यक्ज्ञानसे जो मिश्रित नहीं है? ऐसे भेददृष्टियुक्त केवल कर्मयोगका ही उपदेश करते हैं। ( ज्ञानकर्मके समुच्चयका नहीं )। तथा ( यह भी युक्तिसिद्ध है कि ) ईश्वरभाव और सेवकभाव परस्परविरुद्ध है इस कारण प्रमाणद्वारा आत्माको साक्षात् ईश्वररूपजान लेनेके बाद? कोई भी? किसीका सेवक बनना नहीं चाहता।
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