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तथा वैधर्म्यात् 1/1/35


संधि विच्छेद:

  • तथा + वैधर्म्यात्।

पदच्छेद और अर्थ:

  1. तथा:
    • अर्थ: उसी प्रकार, इस प्रकार।
    • संदर्भ: वैधर्म्य (असमानता) के माध्यम से भी तर्क को स्पष्ट करने के लिए।
  2. वैधर्म्यात्:
    • वैधर्म्य (विपरीत धर्म या असमानता) + आत् (पंचमी विभक्ति) = असमानता के आधार पर।
    • अर्थ: असमान गुणों के कारण।

पूरा अर्थ:

"तथा वैधर्म्यात्" का अर्थ है:

"उसी प्रकार असमानता के आधार पर।"


व्याख्या:

न्याय दर्शन में किसी तर्क को सिद्ध करने के लिए न केवल समानता (साधर्म्य) बल्कि असमानता (वैधर्म्य) का भी उपयोग किया जाता है।

  • वैधर्म्य का प्रयोग यह दिखाने के लिए किया जाता है कि जिन परिस्थितियों में कोई गुण (साध्य) नहीं होता, वहाँ उसका कारण (हेतु) भी नहीं होता।

उदाहरण सहित:

तर्क: "पर्वतो वह्निमान् धूमवत्त्वात्।" (पहाड़ में आग है क्योंकि वहाँ धुआँ है।)

  • साधर्म्य के आधार पर: चूल्हे में धुआँ है और वहाँ आग होती है।
  • वैधर्म्य के आधार पर: जहाँ धुआँ नहीं है, वहाँ आग भी नहीं होती। उदाहरण: तालाब, जो न धूमवान है और न वह्निमान।

वैधर्म्य का उद्देश्य:

असमानता (वैधर्म्य) के आधार पर यह सिद्ध करना कि यदि कोई गुण उपस्थित नहीं है, तो उसका कारण भी अनुपस्थित होगा।


महत्व:

  1. वैधर्म्य का उपयोग किसी तर्क को नकारात्मक दृष्टिकोण से प्रमाणित करने में किया जाता है।
  2. यह यह दिखाता है कि विपरीत गुणों की अनुपस्थिति भी साध्य और हेतु के संबंध को स्पष्ट कर सकती है।
  3. वैधर्म्य न्याय दर्शन की तर्क प्रक्रिया को अधिक संतुलित और व्यापक बनाता है।

सारांश:

"तथा वैधर्म्यात्" का अर्थ है:

"उसी प्रकार असमानता के आधार पर तर्क करना।"

यह तर्क की उस विधि को दर्शाता है जहाँ असमानता का उपयोग किसी निष्कर्ष को प्रमाणित करने के लिए किया जाता है।