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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।12.5।।किंतु --, ( उनको ) क्लेश अधिकतर होता है। यद्यपि मेरे ही लिये कर्मादि करनेमें लगे हुए साधकोंको भी बहुत क्लेश होता है? परंतु जिनका चित्त अव्यक्तमें आसक्त है? उन अक्षरचिन्तक परमार्थदर्शियोंको तो देहाभिमानका परित्याग करना पड़ता है? इसलिये उन्हें और भी अधिक क्लेश उठाना पड़ता है। क्योंकि जो अक्षरात्मिका अव्यक्तगति है वह देहाभिमानयुक्त पुरुषोंको बड़े कष्टसे प्राप्त होती है? अतः उनको अधिकतर क्लेश होता है। उन अक्षरोपासकोंका जैसा आचारविचारव्यवहार होता है वह आगे ( अद्वेष्टाइत्यादि श्लोकोंसे बतलायेंगे।