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Hindi Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka ।।12.4।।तथा जो इन्द्रियोंके समुदायको भली प्रकार संयम करके -- उन्हें विषयोंसे रोककर? सर्वत्र -- सब समय समबुद्धिवाले होते हैं अर्थात् इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें जिनकी बुद्धि समान रहती है? ऐसे वे समस्त भूतोंके हितमें तत्पर अक्षरोपासक मुझे ही प्राप्त करते हैं। उन अक्षरउपासकोंके सम्बन्धमें वे मुझे प्राप्त होते हैं इस विषयमें तो कहना ही क्या है क्योंकि ज्ञानीको तो मैं अपना आत्मा ही समझता हूँ यह पहले ही कहा जा चुका है। जो भगवत्स्वरूप ही हैं उन संतजनोंके विषयमें युक्ततम या अयुक्ततम कुछ भी कहना नहीं बन सकता।
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