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साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा 1/1/33


संधि विच्छेद:

  • साध्य + निर्देशः + प्रतिज्ञा।

पदच्छेद और अर्थ:

  1. साध्य:
    • साध्य = साधन के द्वारा सिद्ध किया जाने वाला।
    • अर्थ: वह बात जिसे सिद्ध करना हो।
    • उदाहरण: "पर्वतो वह्निमान्" (पहाड़ में आग है)। यहाँ "वह्निमान्" साध्य है।
  2. निर्देशः:
    • निर्देशन = संकेत या उल्लेख।
    • अर्थ: किसी विशेष बात की ओर ध्यान आकर्षित करना।
    • उदाहरण: "यहाँ साध्य 'वह्निमान्' है।"
  3. प्रतिज्ञा:
    • प्रतिज्ञ (प्रतिज्ञा) = किसी बात को स्थापित करने का कथन।
    • अर्थ: वह वाक्य जिससे किसी तथ्य की स्थापना की जाती है।
    • उदाहरण: "पर्वतो वह्निमान्" (पहाड़ में आग है)।

पूरा अर्थ:

जिस कथन में साध्य (सिद्ध करने योग्य तथ्य) का उल्लेख या निर्देश किया जाता है, उसे प्रतिज्ञा कहते हैं।


व्याख्या:

न्याय दर्शन में प्रतिज्ञा तर्क के पाँच अवयवों में से पहला और सबसे महत्वपूर्ण अवयव है।

  • इसमें उस बात को स्पष्ट किया जाता है जिसे सिद्ध करना है।
  • प्रतिज्ञा वह आधारभूत कथन है, जो तर्क की शुरुआत करता है।

उदाहरण:

यदि तर्क है: "पहाड़ में आग है।"

  • इसमें "आग है" (वह्निमान्) साध्य है।
  • और इस साध्य का उल्लेख "पर्वतो वह्निमान्" के माध्यम से किया गया है, जिसे प्रतिज्ञा कहते हैं।

महत्व:

  1. प्रतिज्ञा तर्क-वितर्क की प्रक्रिया का आरंभिक चरण है।
  2. यह श्रोताओं को यह बताने का कार्य करता है कि तर्क का उद्देश्य क्या है।
  3. प्रतिज्ञा के बिना तर्क असंगत और अप्रासंगिक हो सकता है।
  4. यह तर्क में साध्य (उद्देश्य) को स्पष्ट और केंद्रित बनाता है।

न्याय दर्शन में स्थान:

प्रतिज्ञा का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह तर्क को एक स्पष्ट दिशा प्रदान करती है।

  • यह साध्य का स्पष्ट रूप से उल्लेख करके इसे शेष तर्क (हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन) के साथ जोड़ती है।

सारांश:

प्रतिज्ञा वह वाक्य है जिसमें साध्य का स्पष्ट निर्देश होता है। यह तर्क की पहली सीढ़ी है, और इसका उद्देश्य साध्य की पहचान और उसका उल्लेख करना है।