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प्रतिज्ञाहेतुदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः 1/1/32
संधि विच्छेद:
- प्रतिज्ञा + हेतु + उदाहरण + उपनय + निगमन + अन्य + अवयवाः।
पदच्छेद और अर्थ:
- प्रतिज्ञा:
- प्रतिज्ञ (प्रतिज्ञा) = किसी बात का कथन या स्थापना।
- अर्थ: कथन या सिद्ध करने का दावा।
- उदाहरण: "पर्वतो वह्निमान्" (पहाड़ में आग है)।
- हेतु:
- कारण।
- अर्थ: प्रतिज्ञा को सिद्ध करने का आधार।
- उदाहरण: "धूमवत्" (क्योंकि धुआँ है)।
- उदाहरण:
- उदाहरण = प्रमाण के रूप में दिया गया दृष्टांत।
- अर्थ: किसी सामान्य सत्य का प्रमाण देने के लिए दिया गया उदाहरण।
- उदाहरण: "यथा महात्मनो धूमवन्तः वह्निमन्तः" (जैसे चूल्हे में धुआँ होता है, वहाँ आग होती है)।
- उपनय:
- उप (निकट) + नय (लाना) = विशेष सत्य की ओर ध्यान खींचना।
- अर्थ: प्रतिज्ञा और उदाहरण का संबंध दिखाना।
- उदाहरण: "तथा चायम्" (और यह भी ऐसा ही है)।
- निगमन:
- निष्कर्ष।
- अर्थ: अंतिम परिणाम या सिद्धांत।
- उदाहरण: "तस्मात् वह्निमान्" (अतः पहाड़ में आग है)।
- अन्य:
- अन्य = शेष।
- अर्थ: जो अवयव बाकी हैं।
- अवयवाः:
- अवयव (भाग) = भाग या तत्व।
- अर्थ: किसी तर्क के अंग।
पूरा अर्थ:
प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, और निगमन ये तर्क-वितर्क के पाँच आवश्यक अवयव (अंग) हैं।
व्याख्या:
न्याय दर्शन में पंचावयव तर्क को तर्क की विधि समझाया गया है। यह किसी तथ्य को सिद्ध करने की तार्किक प्रक्रिया को रेखांकित करता है।
पंच अवयव:
- प्रतिज्ञा:
- किसी बात को स्थापित करना।
- उदाहरण: "पर्वतो वह्निमान्" (पहाड़ में आग है)।
- हेतु:
- प्रतिज्ञा को सिद्ध करने का कारण।
- उदाहरण: "धूमवत्" (क्योंकि धुआँ है)।
- उदाहरण:
- सामान्य सिद्धांत का प्रमाण।
- उदाहरण: "यथा महात्मनो धूमवन्तः वह्निमन्तः" (जैसे चूल्हे में धुआँ होता है, वहाँ आग होती है)।
- उपनय:
- उदाहरण को प्रतिज्ञा से जोड़ना।
- उदाहरण: "तथा चायम्" (और यह भी ऐसा ही है)।
- निगमन:
- निष्कर्ष पर पहुँचना।
- उदाहरण: "तस्मात् वह्निमान्" (अतः पहाड़ में आग है)।
उदाहरण सहित विवरण:
तर्क:
"पर्वतो वह्निमान्" (पहाड़ में आग है)।
- प्रतिज्ञा: "पर्वतो वह्निमान्" (पहाड़ में आग है)।
- हेतु: "धूमवत्" (क्योंकि धुआँ है)।
- उदाहरण: "यथा महात्मनो धूमवन्तः वह्निमन्तः" (जैसे चूल्हे में धुआँ होता है, वहाँ आग होती है)।
- उपनय: "तथा चायम्" (और यह भी ऐसा ही है)।
- निगमन: "तस्मात् वह्निमान्" (अतः पहाड़ में आग है)।
महत्व:
- न्याय दर्शन में यह विधि प्रमाणिक और तर्कसंगत निष्कर्ष निकालने का आधार है।
- यह वैज्ञानिक और दार्शनिक चिंतन में भी उपयोगी है, जहाँ किसी तथ्य को प्रमाणित करना आवश्यक होता है।
- यह विधि हमें सिखाती है कि किसी निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए उचित कारण, प्रमाण और दृष्टांत आवश्यक हैं।